सोचती हूं बचपन ही अच्छा था।
भोला था, भला था और मन का सच्चा था,
आज की तरह न मेरा मन इतना पक्का था,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था।।
लगती थी चोट शरीर पर , दिल पर चोट का न कोई थक्का था,
माँ की डांट में प्यार
और पिता के इंकार में भी संसार दीखता था,
जब देखती हूं आज मुड़कर पुरानी उन तस्वीरों को ,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था ।।
स्कूल का वो दस किलो का भारी बस्ता भी,
आज की जिम्मेदारियों से हल्का लगता था,
जब हो जाती थी बिजली यूंही बेटाइम गुल,
बिजली के जाने पर भी न अंधकार दीखता था,
जब देखती हूं आज मुड़कर पुरानी उन तस्वीरों को,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था।।
माँ जो देती कुछ भी लंच के डिब्बे में,
वो सादा खाना भी पकवान से कम न लगता था,
जो छोटे भाई पर छोड़ा हाथ भी तो,
उसका सम्मान भी न डिगता था।।
वो परीक्षाओं का लंबा चौड़ा निबंध भी,
बिलकुल न लम्बा लगता था,
जब देखती हूं आज मुड़कर पुरानी उन तस्वीरों को,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था ।।
झुककर करना नमस्कार बड़ो को,
ये कभी न हमको खलता था,
जो देख न पाए जुड़े हाथों को
तो,
नज़रअंदाज़ होना न बुरा लगता था।।
जब देखती हूं आज मुड़कर पुरानी उन तस्वीरों को,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था।।
लड़ना वो जानवरो जैसा बहन भाई का,
और अगले ही पल फिर एक हो जाना उनका,
मन को कभी इतना दुख न पहुंचता था,
वो एक निवाला लपककर खाने की खीज में भी,
बेइन्तहा प्यार दीखता था,
जब देखती हूं आज मुड़कर पुरानी उन तस्वीरों को,
सोचती हूं बचपन ही अच्छा था ।।
Well Said
ReplyDeleteLooks like a pro work.. way to go Monica😊
ReplyDelete❤
Deleteपढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गई.. 🥺
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